जब डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं कि वे ईरान की "किल लिस्ट" में सबसे ऊपर हैं, तो इसे महज़ उनकी पुरानी आदत या ध्यान खींचने का चुनावी हथकंडा मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह बयान उन्होंने पहली बार तब दिया था जब अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने उन्हें एक गोपनीय ब्रीफिंग में सीधे तौर पर सचेत किया था। आज के दौर में जब वैश्विक राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है, यह समझना बेहद ज़रूरी है कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच की यह दुश्मनी किसी एक बयान से बहुत आगे निकल चुकी है। ट्रंप खुद कहते हैं कि उन्हें टिकटॉक पर नंबर वन होना ज़्यादा पसंद आता, लेकिन सच्चाई यह है कि वे सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस वक्त सबसे बड़ी सिरदर्दी बने हुए हैं।
यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि अमेरिकी खुफिया विभाग (DNI) ने आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि की थी कि ईरान लगातार ट्रंप को निशाना बनाने की फिराक में है। लेकिन सवाल उठता है कि तेहरान के लिए ट्रंप इतने बड़े दुश्मन क्यों बन गए? क्या इसके पीछे सिर्फ उनका पुराना कार्यकाल है या फिर कोई ऐसी गहरी टीस है जो ईरान भूल नहीं पा रहा है? You might also find this connected coverage useful: The Real Reason Iran Fm Araghchi Thanks Iraq After Khamenei Funeral Ceremonies.
सुलेमानी की मौत और ईरान का कभी न मिटने वाला गुस्सा
बात साल 2020 की है। अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने खाड़ी देशों की पूरी राजनीति को हिलाकर रख दिया। बगदाद हवाई अड्डे के पास एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के सबसे ताकतवर सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया गया। सुलेमानी सिर्फ एक जनरल नहीं थे। वे ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के सबसे करीबी और कुद्स फोर्स के प्रमुख थे।
ईरान ने उसी दिन कसम खाई थी कि वह इसका बदला लेकर रहेगा। जब ट्रंप ने दोबारा सत्ता में आने की तैयारी शुरू की, तो ईरान का यह गुस्सा एक सुनियोजित साजिश में बदल गया। खुफिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान ने ट्रंप को मारने के लिए बाकायदा भाड़े के हत्यारों और नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। As highlighted in latest reports by USA.gov, the effects are widespread.
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। अमेरिकी न्याय विभाग ने खुद न्यूयॉर्क की एक अदालत में ऐसे मामलों का खुलासा किया है। फरहाद शाकेरी नाम के एक ईरानी एजेंट पर सीधे तौर पर ट्रंप की जासूसी करने और उनकी हत्या की योजना बनाने के आरोप तय किए गए। शाकेरी आज भी ईरान में छुपा बैठा है। इसी तरह आसिफ मर्चेंट नाम के एक अन्य संदिग्ध को ब्रुकलिन में पकड़ा गया, जो अमेरिकी अपराधियों को पैसे देकर ट्रंप पर हमला करवाने की कोशिश कर रहा था। ये दोनों मामले साबित करते हैं कि ईरान महज़ जुबानी धमकियां नहीं दे रहा था, बल्कि जमीन पर उसकी टीमें काम कर रही थीं।
क्या अमेरिकी सुरक्षा तंत्र ट्रंप को बचा पा रहा है
ईरान की इस आक्रामकता ने अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के सामने एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है। किसी पूर्व राष्ट्रपति या मौजूदा उम्मीदवार को इस स्तर का विदेशी खतरा होना सामान्य बात नहीं है। ट्रंप की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए सेना के स्तर की गाड़ियां और विशेष काउंटर-असॉल्ट टीमों को तैनात करना पड़ा।
अमेरिकी अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ईरान किसी पारंपरिक सेना की तरह हमला नहीं करता। वह साइबर हमलों, सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार और स्थानीय अपराधियों के नेटवर्क का इस्तेमाल करता है। ट्रंप के चुनाव अभियान के दौरान उनके कंप्यूटर सिस्टम को हैक करने के पीछे भी ईरानी हैकर्स का ही हाथ पाया गया था। वे सिर्फ ट्रंप की जान ही नहीं लेना चाहते, बल्कि वे अमेरिकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी पंगु बना देना चाहते हैं।
लेकिन ट्रंप का रुख इस खतरे के सामने झुकने वाला नहीं रहा है। उन्होंने ओवल ऑफिस में साफ लहजे में चेतावनी दी थी कि अगर ईरान ने उनकी जान लेने की कोशिश की, तो वे उस देश को पूरी तरह से "नेस्तनाबूद" (Obliterate) कर देंगे। उन्होंने साफ कहा था कि उनके जाने के बाद भी अमेरिकी सेना को ऐसे निर्देश दिए जा चुके हैं कि ईरान का नामोनिशान मिटा दिया जाए।
चुनावी चाल या वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा संकट
कई विश्लेषकों का मानना था कि ट्रंप सुरक्षा के इस मुद्दे को भुनाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे थे। राजनीति में ऐसा होना नई बात नहीं है। लेकिन जब देश की शीर्ष खुफिया एजेंसियां संसद को बंद कमरे में ब्रीफिंग देकर बताएं कि खतरा वास्तविक है, तो राजनीति पीछे छूट जाती है।
विपक्ष के कई नेताओं ने ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि सुलेमानी को मारकर ट्रंप ने अमेरिका को एक अंतहीन युद्ध की आग में झोंक दिया है। लेकिन ट्रंप के समर्थकों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि अगर अमेरिका अपने दुश्मनों को कड़ा संदेश नहीं देगा, तो दुनिया भर में उसकी धाक खत्म हो जाएगी।
इस पूरे विवाद का असर खाड़ी देशों की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। ईरान लगातार अपनी मिसाइल क्षमताओं को बढ़ा रहा है और उसके हौसले बुलंद हैं। अमेरिका के इस अंदरूनी संकट ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वाशिंगटन सचमुच अपने नेताओं की रक्षा करने में सक्षम है या ईरान जैसी बाहरी ताकतें अमेरिकी धरती पर आकर बड़े ऑपरेशनों को अंजाम दे सकती हैं।
भविष्य की राह और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इस खतरे से निपटने के लिए अमेरिका को अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने होंगे। सिर्फ सीक्रेट सर्विस के घेरे को बढ़ा देने से काम नहीं चलेगा।
- सबसे पहले ईरान के वित्तीय नेटवर्क पर और कड़े प्रतिबंध लगाने होंगे ताकि वह अमेरिकी धरती पर भाड़े के हत्यारों को पैसे न भेज सके।
- साइबर सुरक्षा को इस स्तर पर ले जाना होगा जहां विदेशी हैकर्स अमेरिकी नेताओं के डेटा में सेंध न लगा सकें।
- खुफिया एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल को और बेहतर करना होगा ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत मिल सके।
खतरा टला नहीं है। ईरान की सूची में ट्रंप आज भी पहले स्थान पर बने हुए हैं। अमेरिकी सुरक्षा तंत्र के लिए आने वाला समय बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाला है क्योंकि एक छोटी सी चूक भी पूरी दुनिया को एक भयानक युद्ध की ओर धकेल सकती है।
Donald Trump on Iran Kill List यह वीडियो दर्शाता है कि कैसे डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस बात को स्वीकार किया कि वे ईरान के निशाने पर सबसे ऊपर हैं और सुरक्षा एजेंसियां इसे लेकर कितनी गंभीर हैं।