क्यों डोनाल्ड ट्रंप चीन को किसी भी कीमत पर क्रिप्टो और एआई की रेस में जीतने नहीं देना चाहते

क्यों डोनाल्ड ट्रंप चीन को किसी भी कीमत पर क्रिप्टो और एआई की रेस में जीतने नहीं देना चाहते

डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि अगर अमेरिका को दुनिया का सबसे ताकतवर देश बने रहना है, तो उसे दो नए मोर्चों पर किसी भी कीमत पर चीन को धूल चटानी होगी। पहला मोर्चा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, और दूसरा है क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल एसेट्स का उभरता हुआ साम्राज्य। ट्रंप ने हाल ही में अमेरिकी सीनेट से एक बड़ा कानून पास करने की पुरजोर वकालत की है। इस कानून का नाम है क्लैरिटी एक्ट (Clarity Act)।

ट्रंप का यह कदम सिर्फ एक सामान्य बिल को पास कराने की कोशिश नहीं है। यह सीधे तौर पर चीन को आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर घेरने की एक सोची-समझी रणनीति है। अगर अमेरिका यहाँ चूका, तो ट्रंप के मुताबिक दुनिया का पूरा फाइनेंशियल सिस्टम और आने वाली तकनीक बीजिंग के हाथों में खेल सकती है।

दिवंगत सांसद लिंडसे ग्राहम और ट्रंप का बड़ा दांव

इस पूरी राजनीतिक हलचल के पीछे एक भावुक और रणनीतिक मोड़ भी है। हाल ही में दक्षिण कैरोलिना के कद्दावर रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम का 71 वर्ष की आयु में अचानक निधन हो गया। ग्राहम अमेरिकी संसद में ट्रंप के बहुत करीबी सहयोगियों में से एक थे।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल (Truth Social) पर एक बेहद आक्रामक पोस्ट लिखी। उन्होंने लिखा कि दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में अमेरिकी सीनेट को तुरंत क्लैरिटी एक्ट पास कर देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी देते हुए साफ कहा कि चीन और कई अन्य देश क्रिप्टो के इस बड़े वित्तीय बदलाव और एआई सेक्टर पर पूरी तरह नियंत्रण करना चाहते हैं। ट्रंप ने अमेरिकी सांसदों को ललकारते हुए लिखा कि हम अभी इस रेस में आगे हैं, लेकिन वे बहुत तेजी से हमारा पीछा कर रहे हैं। किसी भी कीमत पर चीन को इन दोनों क्षेत्रों में जीतने मत देना।

हालांकि, राजनीति के जानकार जानते हैं कि ग्राहम सीधे तौर पर इस क्रिप्टो बिल को लिखने में शामिल नहीं थे। वे सीनेट की बैंकिंग कमेटी के सदस्य भी नहीं थे। लेकिन ट्रंप ने उनके नाम का इस्तेमाल करके सीनेट में इस अटके हुए कानून को जल्द से जल्द पास कराने के लिए एक मजबूत भावनात्मक दबाव बनाया है।

आखिर क्या है क्लैरिटी एक्ट जिससे ड्रैगन सहमा है

सरल शब्दों में कहें तो क्लैरिटी एक्ट अमेरिकी क्रिप्टो बाजार के लिए नियमों की एक ऐसी साफ-सुथरी किताब है, जो इस पूरे उद्योग को कानूनी सुरक्षा देगी। अभी तक अमेरिका में क्रिप्टो को लेकर नियमों का बहुत झोल रहा है। कभी एसईसी (SEC) इसके पीछे पड़ जाता है, तो कभी कोई और सरकारी एजेंसी। क्रिप्टो कंपनियां सालों से गुहार लगा रही थीं कि हमें साफ नियम दो ताकि हम खुलकर बिजनेस कर सकें।

क्लैरिटी एक्ट इसी अनिश्चितता को खत्म करता है। यह तय करता है कि कौन सा डिजिटल एसेट कमोडिटी है और कौन सा सिक्योरिटी। कॉइनबेस (Coinbase), रिपल (Ripple) और सर्कल (Circle) जैसी दुनिया की सबसे बड़ी क्रिप्टो कंपनियां इस बिल के समर्थन में खड़ी हैं। उन्हें लगता है कि एक बार नियम साफ हो गए, तो मुख्यधारा के बड़े निवेशक खुलकर क्रिप्टो बाजार में खरबों डॉलर झोंक देंगे।

ट्रंप का सोचना बहुत सीधा है। अगर अमेरिका क्रिप्टो के नियम तय करने वाला पहला देश बन जाता है, तो पूरी दुनिया को अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी वित्तीय नियमों के आगे घुटने टेकने होंगे। चीन लंबे समय से अपनी खुद की डिजिटल करेंसी (e-CNY) के जरिए डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। क्लैरिटी एक्ट लाकर ट्रंप चीन के इसी सपने पर पानी फेरना चाहते हैं।

अमेरिका में क्यों छिड़ी है इस बिल पर रार

अगर यह बिल इतना ही अच्छा है, तो यह अब तक पास क्यों नहीं हुआ? इसकी कुछ बड़ी वजहें हैं जो अमेरिकी राजनीति के विरोधाभासों को दिखाती हैं।

पहला विरोध पारंपरिक बैंकों की तरफ से आ रहा है। बैंकों को डर है कि अगर क्लैरिटी एक्ट पास हो गया, तो लोग अपना पैसा बैंकों में जमा करने के बजाय डिजिटल स्थिर मुद्राओं (Stablecoins) में रखने लगेंगे। इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए नकदी कम हो जाएगी। उनका पूरा बिजनेस मॉडल खतरे में आ सकता है।

दूसरा विरोध डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं की तरफ से है। वे चाहते हैं कि इस बिल में नेताओं के क्रिप्टो व्यापार पर कड़ी नजर रखने के लिए और सख्त नियम जोड़े जाएं।

इसमें ट्रंप का अपना निजी हित भी आड़े आ रहा है। हालिया वित्तीय खुलासों से पता चला है कि खुद डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल क्रिप्टो से जुड़े कामों से लगभग 1.2 अरब डॉलर की भारी-भरकम कमाई की है। विपक्ष का आरोप है कि ट्रंप खुद फायदे में हैं, इसलिए वे इस कानून को जल्द से जल्द पास कराना चाहते हैं।

💡 You might also like: st john of the cross salvador dali

इन सब विवादों के बीच सीनेट में संख्या बल का खेल भी बदल गया है। सीनेटर ग्राहम के निधन के बाद सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत 53 से घटकर 52 सीटों पर आ गया है। ऐसे में इस बिल को बिना विपक्षी डेमोक्रेट्स के समर्थन के पास कराना आसान नहीं होने वाला।

एआई और चिप्स की असली वैश्विक जंग

बात सिर्फ क्रिप्टो की नहीं है। ट्रंप के बयान में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण शब्द था—एआई (AI)। आज के समय में एआई तकनीक ही वो ताकत है जो तय करेगी कि आने वाले दशकों में दुनिया की महाशक्ति कौन बनेगा। और एआई को चलाने के लिए चाहिए सबसे एडवांस माइक्रोचिप्स।

ट्रंप प्रशासन ने एक तरफ तो चीन को एआई रेस से बाहर रखने के लिए एडवांस अमेरिकी चिप्स के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन हाल ही में ट्रंप ने एनवीडिया (Nvidia) और एएमडी (AMD) जैसी अमेरिकी कंपनियों को चीन को कुछ पुराने चिप्स बेचने की छूट देकर सबको चौंका दिया था। इसके बदले अमेरिकी सरकार इन कंपनियों की कमाई से 15% का हिस्सा ले रही है।

इस दोहरी नीति की काफी आलोचना भी हो रही है। एलिजाबेथ वारेन जैसे विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन की ढिलाई के कारण एडवांस एआई चिप्स किसी न किसी तरह चीन तक पहुंच रहे हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।

लेकिन ट्रंप का नजरिया अलग है। उनका मानना है कि अमेरिकी कंपनियों को मुनाफा कमाने देना चाहिए ताकि वे रिसर्च में और आगे निकल सकें, जबकि चीनी एआई मॉडल्स को केवल वही तकनीक मिले जो पुरानी पड़ चुकी हो। ट्रंप ने हाल ही में एआई मॉडल्स की सुरक्षा जांच के लिए एक नए कार्यकारी आदेश पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े खतरों को 30 दिनों के भीतर परखने का ढांचा तैयार करता है।

आगे की राह और भारत के लिए सबक

यह वैश्विक जंग केवल वाशिंगटन और बीजिंग तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर भारत जैसे तेजी से बढ़ते तकनीकी हब पर भी पड़ेगा। अगर अमेरिका क्लैरिटी एक्ट के जरिए डिजिटल एसेट्स के नियम तय कर देता है, तो भारत को भी अपनी नीतियों में बदलाव करना होगा।

भारत के लिए यहाँ से कुछ साफ सबक मिलते हैं।

  1. नियमों की स्पष्टता जरूरी है: अमेरिका की तरह भारत को भी क्रिप्टो और एआई सेक्टर के लिए हवा में तीर चलाने के बजाय बेहद सटीक और स्पष्ट कानून बनाने होंगे।
  2. घरेलू स्टार्टअप्स को बढ़ावा: एआई और ब्लॉकचेन में केवल विदेशी तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय भारत को अपने खुद के सुपरकंप्यूटिंग और एआई चिप्स डिजाइन उद्योग को सरकारी मदद देनी होगी।
  3. सुरक्षा और व्यापार का संतुलन: राष्ट्रीय सुरक्षा को ताक पर रखे बिना तकनीकी विकास के लिए फंड और निवेश के रास्ते खोलने होंगे।

आने वाले हफ्ते अमेरिकी सीनेट के लिए बेहद गहमागहमी वाले रहने वाले हैं। देखना होगा कि ट्रंप अपने दिवंगत मित्र के नाम पर सीनेट से इस बिल को पास करा पाते हैं या अमेरिका की अंदरूनी गुटबाजी का फायदा उठाकर चीन इस तकनीकी रेस में आगे निकल जाता है।

क्लैरिटी एक्ट के सीनेट में आगे बढ़ने और क्रिप्टो पर होने वाले इसके बड़े असर पर ब्लूमबर्ग की खास रिपोर्ट

यह वीडियो इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इसमें ब्लूमबर्ग के विशेषज्ञों ने क्लैरिटी एक्ट के सीनेट बैंकिंग समिति से पास होने के महत्व, बैंकों के इसके प्रति विरोध और डिजिटल डॉलर के भविष्य पर विस्तार से चर्चा की है।

JW

Julian Watson

Julian Watson is an award-winning writer whose work has appeared in leading publications. Specializes in data-driven journalism and investigative reporting.